Friday, March 17, 2006

होस्टल - Hostel

Even years after I left Hostel I had dreams of my Hostel days. This one was a real dream that I had once when I was living in Pride Apartments in Bangalore.




हॉस्टल


बजा अलारम, उठके भागा     बाहर देखा लाइन लगी थी

सेंटी मारा, फंडे मारे     लेकिन चाल काम न आई

दस मिनट में नंबर आया     तब जाके कुछ राहत आयी

जल्दी जल्दी तैयार होके     जैसे ही बस दौड़ लगाई

तभी बगल वाले कमरे से     बड़ी ज़ोर से आवाज़ आई

MA110 के लेक्चर में     प्रोक्सी मार देना अग्गू भाई

बाहर देखा केंटीन में     फिर वही लंबी लाइन पाई

खाके भागा कोसते कोसते     इंस्टी इतनी दूर क्यूँ बनाई

अटेंडेंस की फाइट न होती     हम भी सोते ओड़ रज़ाई

क्लास रूम में जाके देखा     Rear Rows तो भरी पड़ी हैं

Front Rows से डर लगता है     फिर भी वहीँ बैठना पड़ता है

किसी तरह से क्लासेज सारी     मॉर्निंग की तो निकल गयीं हैं

आफ्टरनून में लंच करके     अब फाइट हो गयी जगने की 

किसी तरह से दस मिनट तक     कोशिश करता रहा सुनने की

धीमें धीमें सब शुन्य हो गया     आँखों में नींद घिर आई

जब आँख खुली तो सामने देखा     दूसरी टीचर कहाँ से आई

बगल वाले से चौंक के पूंछा     क्या मांजरा है समझाना भाई

बिना बात Mech. इंजीनियर ने     Comp. Sc. की क्लास लगायी

शाम हुयी अब किस की चिंता     खेलो कूदो मौज मनाओ

और नहीं तो गप्पें मार के     अपनी G. K. और बढ़ाओ

बिना बात की गप्पों में भी     साड़ी रात गुज़र गयी है

सोने का सोचा तो देखा     ये तो सुबह ही हो गयी हे

नींद की कोई बात नहीं हे     क्लासेज में तो सो लेते हैं

पर गप्पें मारना ज़रूरी     फंडे क्लियर इसी से होते हैं

तभी बजा फिर से अलार्म     उठके देखा सब सपना था

हॉस्टल के दिन बीत गए हैं     ये तो Pride Apartment का कमरा था

पर अब भी कुछ बदला नहीं है     अभी भी भागना पड़ता है

अभी भी लाइनें लगानी पड़तीं हैं     और फंडे क्लियर करने को

गप्पें मारनी पड़तीं हैं



1 comment:

chetan vikram said...

thts really nice one... i'm a final yr. engg student. thts a real nice work....

chetan vikram.
NIT Nagpur.