I am a big fan of Bhachchan Ji's Madhushaala and read it many time in my college days. When I heard about Bhachchan Ji's sad demise on Jan 18th 2003, I wrote this little piece of poem to pay him my humble tribute
बच्चन जी को श्रद्धांजलि
घर से रोज़ निकलता हूँ में हाँथ लिए खाली प्याला |
पता नहीं किस मोड़ पे जाके मिल जाएगी मधुशाला ||
तूं डाल ज़रा सी और साकी, ना देख मेरी आँखों में |
दिल उतना ही प्यासा मेरा जितना खाली ये मधुप्याला ||
अमृत कम हे धरती पे तो कहाँ जाये पीने वाला |
अभी होश ज़रा सा बाकी है तूं बंद मत करना मधुशाला ||
घर से रोज़ निकलता हूँ में हाँथ लिए खाली प्याला |
पता नहीं किस मोड़ पे जाके मिल जाएगी मधुशाला ||
तूं डाल ज़रा सी और साकी, ना देख मेरी आँखों में |
दिल उतना ही प्यासा मेरा जितना खाली ये मधुप्याला ||
अमृत कम हे धरती पे तो कहाँ जाये पीने वाला |
अभी होश ज़रा सा बाकी है तूं बंद मत करना मधुशाला ||